शरीर क्रिया विज्ञान (Ayurvedic physiology) # topic - 2nd

             🌱   अध्याय - 1   🌱  

                          शरीर        

  Q. शरीर की परिभाषा  
तत्र शरीर नाम चेतनाधिष्ठानभूत   पञ्चमहाभूतविकार समुदायात्मकम् समयोगवाहि । (च. सू. 6/4) 

भावार्थ- चेतना (आत्मा) का अधिष्ठान और पञ्चमहाभूत रुपी विकारों का समुदाय शरीर कहलाता है। यह शरीर समयोगवाही है अर्थात् सप्तधातु , तीन दोष एवं मलों के साम्यावस्था में रहने पर ही गति करता है। 

   

*  आचार्य सुश्रुत के शब्दों में शरीर की परिभाषा इस प्रकार है-                                                            शुक्र शोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृति विकार संमूर्च्छितं' गर्भ ' इत्युच्यते । तं चेतनावस्थितं वायुर्विभजति, तेज एनं पचति आप: क्लेदयन्ति ,पृथिवी संहति , आकाशं विवर्धयति,एवं विवर्धित: स यदा हस्तपादजिह्वाघ्राणकर्णनितम्बादिभिरङ्गैरुपेतस्तदा 'शरीर' इति संज्ञां लभते ।     

    तच्च षडङ्गं शाखाश्चतस्त्रो ,मध्यं पंचमं , षष्ठं शिर इति।। (सु. शा. 5/3)

भावार्थ - शुक्र (Spermatozoa) और शोणित (Ovum)  का गर्भाशय (Uterus) में संयोग होने पर उसमें आत्मा ,आठ प्रकृतियों ( अव्यक्त - महान - अहंकार - पंचतन्मात्रा ) इन सबका संयोग होता है , तब उसे गर्भ कहते हैं ।

                 उसमें चेतना का वास हो तो वायु उसे विभाजित करती है , तेज (पित्त) इसे पचाता है, जल क्लिनता पैदा करता है , पृथ्वी तत्व से संहनन और घनता उत्पन्न होती है , और आकाश तत्व द्वारा रिक्तता ( आकार मे वृद्धि , खाली स्थान ) निर्माण होकर उसका आकार बढ़ता है । इस प्रकार पाॅंचो महाभूत द्वारा गर्भ पर कार्य होने से जब उसे हाथ , पैर , जिह्वा, नाक, कान, नितम्ब, आदि अंग- प्रत्यंग निर्माण होतें हैं, तब ही उसे शरीर कहा जाता है । 

                                         यह शरीर षडङ्ग होता है , जैसे - चार शाखाएं , पाॅंचवा मध्य शरीर और छठा सिर । इस प्रकार प्रथम इसे 'गर्भ ' और अंग -प्रत्यंग निर्माण के बाद 'शरीर' कहा जाता है।

* "दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् ।" (सु.सू. 15/3)

     दोष-धातु तथा मल ही शरीर के मूल कारण हैं।

     दोष - वात , पित्त, एवं कफ ।

     धातु- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र ।

     मल- स्वेद , मुत्र एवं पुरीष ।

                   तीन दोष ,सप्त धातुएं और तीन मल ये प्राकृतावस्था में शरीर को धारण करते हैं ,इसलिए इन तेरह(13) तत्वों के समूह को शरीर कहते हैं।

* " शीर्यतेऽनेन् इति शरीरम् " ।

    प्रतिपल क्षीण अथवा नष्ट होते रहने के कारण ही इसे शरीर कहते हैं।

🩺🩺📝

शरीर शब्द के पर्याय 

अमर कोशकार नें शरीर के निम्नवत पर्यायों का उल्लेख अपने शब्द कोश में किया है - 

          गात्रं वपु: संहननं शरीरं वर्ण्म वग्रह: ।

        कायो देह: क्लीबपुंसो: स्त्रियां मूर्तिस्तनुस्तनू: ।।

1. गात्र 

2. वपु:

3. संहनन

4. वर्ण्म

5. विग्रह:

6. काय

7. देह

8. मूर्ति

9. तनु

10. तनू

 आयुर्वेदीय वाङ्मय में शरीर के मुख्तया चार पर्यायों का वर्णन प्राप्त होता है-

1. शरीर      2. देह      3. काय      4. पुरुष 

🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱

धातु भेद से पुरुष - संख्या 

धातु  -     "धारणात् धातव: ।"

               शरीर को धारण करने वाले एवं नित्य वृद्धि करने वाले सभी तत्वों को धातु कहते हैं।

पुरुष -        " पुरि (शरीरे) वसति इति पुरुष: ।" 

          जो शरीर भौतिक शरीर में वास (रहता है) करता है ,उसे पुरुष (आत्मा) कहते हैं।

1.  एक धातुज पुरुष -

              "चेतनाधातुरप्येक: स्मृत: पुरुषसंज्ञक: ।" (च.शा. 1/16) 

             चेतना धातुज पुरुष केवल आत्मा को ही कहा जाता है ।

2. षड् धातुज पुरुष - (षड् धातुज् पुरुष ,कर्मपुरुष, चिकित्स पुरुष) 

             "खादयश्चेतनाषष्ठा धातव: पुरुष: स्मृत: । (च.शा. 1/16)

               खादय: अर्थात् आकाश , वायु , अग्नि , जल , पृथ्वी और आत्मा इन छ: धातुओं का पुरुष षड्धात्वात्मक पुरुष कहलाता है। 

    पञ्चमहाभूत + चेतना (आत्मा) = 6


 3. चतर्विंशति धातुज पुरुष - (राशि पुरुष)

          " पुनश्च धातुभेदेन चतुर्विंशतिक: स्मृत: ।                      मनो दशेन्द्रियाण्यर्था: प्रकृतिश्चाष्टधातुकी।। "(च.शा.1/17)

भावार्थ -  धातु भेद से यह पुरुष चौबीस (24) तत्वों का समुदाय है । मन , दश इन्द्रियाॅं , पाॅंच अर्थ और अष्ट धातुओं से युक्त प्रकृति इस प्रकार चौबीस तत्वों का समुदाय है।

 * मन

* दस इन्द्रियाॅं - पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाॅं -  श्रोत्र, त्वक,                   चक्षु,जिह्वा,घ्राण ।

            पाॅंच कर्मेन्द्रियाॅं - वाक् (वाणी), पाणि (हाथ) ,पाद (पैर) ,पायु (गुदा) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय)

 * अर्था-  पञ्चमहाभूत - आकाश, वायु, अग्नि,जल, पृथ्वी।

              

              इस प्रकार मन + दस इन्द्रियाॅं =एकादश इन्द्रिय और पंचमहाभूत मिलाकर सोलह विकार कहे जाते हैं।

        8 प्रकृति +16 विकार =24 

  *अष्ट प्रकृति - अव्यक्त, महान, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रुप, रस, गन्ध) ये अष्ट प्रकृति कहलाते हैं।

4. पञ्चविंशति पुरुष -  सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष के पच्चीस तत्व मानें गए हैं ।

     मूल प्रकृतिरविकृर्तिमहादाद्या: प्रकृतिविकृतय:सप्त । 

    षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्नविकृति पुरुष: ।।(सांख्य का. 3 )

इस प्रकार इन तत्वों को चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता  है ।

क. प्रकृति-                                                      

ख. प्रकृति - विकृति  = महत् , अहंकार, पञ्च तन्मात्रायें

ग.  विकृति - 16 विकार (पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाॅं पाॅंच कर्मेन्द्रियाॅं मन तथा पञ्चमहाभूत ) 

घ. न प्रकृति न विकृति - पुरुष (आत्मा) 


               📝किसी प्रकार का प्रशन ,सन्देह हो तो comment box में जरुर बताएं 

                 Thanks.........


 

           





Comments

Popular posts from this blog

Chapter No - 3 Discription of Dosha, Dhatu & Mala #दोष धातु मल परिचय

BOOK'S OF BAMS SECOND YEAR . बी ए एम एस द्वितीय वर्ष किताबें #BAMS -2nd year

Exam pattern of BAMS Exam first year Course || बी ए एम एस प्रथम वर्ष का परीक्षा पैटर्न # BAMS #1st year #Number of papers.