Chapter No - 3 Discription of Dosha, Dhatu & Mala #दोष धातु मल परिचय
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दोष -
" दूषयन्तीति दोषा:।"
जो शरीर ( शरीरगत धातुओं )को दूषित करे उसे दोष कहते हैं।
That which is responsible to vitiate the other substances is called Dosha . That which vitiates the body as well as the mind is also called Dosha .
"वायु: पित्तं कफश्चोक्त: शारीरो दोष संग्रह:। " (च.सू.1/56)
'शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात् ।
वातपित्तकफा ज्ञेया मलिनीकरणान्मला:।।'(शा.पू.5/24)
भावार्थ- हमारे शरीर में इन वात आदि की स्थिति इस प्रकार है - जब ये शरीर को विकृत या दूषित करते हैं तब ये 'दोष' कहलाते हैं, जब ये मानव को स्वस्थ रखते है तब 'धातु' कहलाते है ,और जब ये शरीर को मलिन करते है तब इन्हें 'मल' कहा जाता है।
These three doshas are also known as 'Dhatu' as they support the body in their state of equilibrium which represent normalacy whereas they are spoken of as 'Doshas' during their disequilibrium state as they vitiate other structural and functional elements of the living body. That which pollute or dirty to other structure of the body is called Mala.
* जिसमें देह की स्वाभाविक क्रियाएं कराने एवं उनपर नियन्त्रण रखनें की सामर्थ्य हो, प्रकृति निर्माण की क्षमता हो और जिसमें स्वतन्त्रतापूर्वक देह को दूषित करने की प्रवृत्ति हो, उसी को दोष कहा जा सकता है।
* The independently production of disease during its abnormal states of functioning. Thus it's name is so called "Dosh" .
Maharshi Sushruta called it as "Tristhuna" by citing the illustration that ,like the house is based on pillars (sthuna), so also the body is based on this tristhuna (Vata, Pitta, and Kapha ).
दोष की संख्या - वायु: पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषा समासत: ।
विकृताऽविकृता देहं घ्नन्ति ते वर्तयन्ति च।। (अ.ह्र.सू.1/6)
आयुर्वेदशास्त्र में संक्षेपत: तीन ही दोष माने जाते हैं - वात, पित्त और कफ। ये तीनो दोष विकृत (बढे अथवा क्षीण) शरीर का विनाश कर देते हैं और अविकृत (समभाव में स्थित) जीवनदान करते हैं अथवा स्वास्थ्य - सम्पादन करने में सहायक होते है।
मानसिक दोषो का परिचय -
रजस्तमश्च मनसो द्वौ च दोषावुदाह्रतौ।। (अं.ह्र.सू.1/21)
मनस् के दो दोष हैं- (1) रजस् (रजोगुण)
(2) तमस् (तमोगुण)
वायु: पित्तं कफश्चोक्त: शारीरोदोषसंग्रह: ।
मानस: पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ।। (च.सू. 1/56)
वास्तव मे मन को प्रभावित करने वाले तीन कारण हैं सत्व, रज एवं तम। परन्तु सत्व गुण स्वयं विशुद्ध है अत: उसके द्वारा मन मे किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नही हो सकता है। शेष दोनों गुण रज एवं तम मन को विकृत करते हैं। इसलिए मानस दोषों मे इन्हीं दोनो की गणना की जाती है।
Number of Dosha -
Generaly Dosha means "Tridosha" as already discussed earlier. But primarly there are two type of Dosha.viz,
(1) Shareereka Dosha ,(Somatic)
(2) Manasika Dosha (Psychic)
"शारीरमानसभेदात् दोषा द्विविधा:।।"
Again shareereka dosha is of 3 type - viz.
(1) Vata
(2) Pitta
(3) Kapha
वायु:पित्तं कफश्चोक्त शारीरो दोष संग्रह:। (च.सू.1/57)
वातपित्तश्लेष्माण एव देहसंभवहेतव:।।(सु.सू.1/57)
Manashika Dosha means which is psychic in nature, is of two types - viz,
(1) Raja dosha
(2) Tama dosha
मानस: पुनरुधिष्टो रजश्च तम एव च ।(च.सू.1/57)
** Some Acharyas considered 'Rakta' as the 4th dosha in the Shareereka dosha by citing some illustration of Sushruta, But in fact due to lack of causative factor of body and lack of independent power of vitiation, Rakta can not be counted in tha dosha triad.
Sushruta in several places state that this body is supported by Vata, Pitta, Kapha & Rakta and the body can not exit without them .
तदेभिरेव शोणितचतुर्थे: संभवस्थितिप्रलयेष्कप्यविरहितं शरीरं भवति । (सु.सू.21/3)
# असाम्यावस्था के कारण -
शारीरिक एवं मानस दोनों प्रकार की असाम्यावस्था ( विषमताओं ) के तीन प्रधान कारण हैं।
त्रिविधं प्रकोपणं तद्यथा -
असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग: प्रज्ञापराध: परिणामश्चेति।।
(च.वि6/7)
*असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग: - इन्द्रियों का अपने विषयों के साथ समयोग न होकर अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग का होना।
* प्रज्ञापराध - प्रज्ञा के अन्तर्गत धी ( निश्चयात्मक बुद्धि), धृति (धारणात्मक बुद्धि) तथा स्मृति (स्मारणात्मक बुद्धि) का समावेश है। इनका अतियोग, अयोग (हीन) या मिथ्यायोग होना प्रज्ञापराध का कारण होता है।
परिणाम - काल (ऋतुजन्य काल अथवा आवस्थिक काल) का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग होना।
धातु -
'धारणात् धातव: ' जो शरीर का धारण करे उसे धातु कहते हैं।
'धारयन्तीति धातव:'
शरीर धातु सात है - रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, तथा शुक्र।
रसासृङ्गमांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातव:। सप्त दूष्या: ।(अ.ह्र.सू.1/13)
** रस - रक्ततादि सात धातुओं ने शरीर को धारण किया है, इसलिए इन्हें धातु कहा गया है।
रस रक्तादि सातो धातुएं वातादि दोषों की विकृति (क्षय - वृद्धि) से दूषित हो जाती है , इसलिए इन्हें दूष्य भी कहा जाता है।
ओज जो कि शुक्राग्नि के द्वारा शुक्र के पाचन के बाद बनता है उसे धातु नही कहा गया है ,क्योंकि यह शरीर का ' बल ' और ' जीवन ' है , इसके नष्ट होने से सम्पूर्ण शरीर नष्ट हो जाता है।
** महर्षि सुश्रुत ने भी इस प्रकार धातु पोषण क्रम में सप्त धातुओं की ही गणना की है।
" रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेद: प्रजायते।
मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्ज्ञ: शुक्रं तु जायते "।।(सु.सू.14/10)
नोट -
( गर्भ के आठवें महीने में ओज अस्थिर रहता है। यही कारण है कि 8वें महीने में पैदा हुए शिशु के जीने की सम्भावना बहुत कम होती है)
** ददाति - धारयति शरीरसंवर्धकान् इति धातु: ।
Means that which promotes the growth of the body is called Dhatu.
From the above definitions, it is cleared that the Dhatu have two meanings viz -
(A) Dharan Karma -(to support)
(B) Poshana Karma - (to nourish)
By the dharana karma, the dhatus are stated that to make structural architecture of the body. The Sapta-dhatus already exists as concrete formed entities viz. Rasa, Rakta, Mamsa, Meda, Asthi, Majja & Shukra.
By the Poshan Karma of Dhatus, are being constantly formed , destroyed and reformed with appropriate materials derived from the Poshaka - dravyas from the time of conception to death.
Dhatus are of two kinds- viz Sthayi or Poshya and Asthayi or poshaka
**( In ayurveda the term Dhatu is being used for dosha , dhatu & mala the basic factor of the body.)
(1) रस - Plasma & lymph tissue
(2) रक्त - Blood tissue
(3) मांस - Muscular tissue
(4) मेद - Adipose tissue
(5) अस्थि - Bone tissue
(6) मज्जा - Bone marrow tissue ( Myeloid tissue)
(7) शुक्र - Reproductive tissue
उपधातु
उपमितं धातुभि: इति उपधातु: ।(का.चि.परिचय)
अर्थात् जो धातु के समान हो अथवा उसके स्वरुप जैसी हो , उसे उपधातु कहते हैं।
That which are not through dhatu, but simillar or identical like nature to dhatu, are spoken as Upa.dhatu
Q. धातु एवं उपधातु में अन्तर (Difference b/w Dhatu & Updhatu)
' ते च स्तन्यादयो धात्वन्तरापोषाच्छरीरपोषका अप्युपधातुशब्देनोच्यन्ते ।।(चक्रपाणि -च.चि. 15/17)
*स्तन्यादयो = स्तन्य + आदि
*धात्वन्तरापोषाच्छरीरपोषका = धातु+अन्तर+अपोष+अच्छ+शरीर
*अप्युपधातुशब्देनोच्यन्ते = अपि+उप+धातु+शब्देन+उच्यन्ते
अर्थ- इसके अन्तर्गत उन रचनाओं को सम्मिलित किया गया है जो शरीर को आधार तो प्रदान करते है परन्तु उसका पोषण नहीं करते, उपधातु कहलाते हैं।इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि धातु-उपधातु के मध्य क्या अन्तर है।
धातुएं शरीर का धारण एवं पोषण कार्य करती हैं जबकि उपधातुएं केवल धारण कर्म करती हैं।
That structural substances which are supporting the body but do not nourish it (the body) are called as Upadhatu.
**(उपधातु) गति विवर्जितम् ।( च.चि.15/17 चक्रपाणि)
आचार्य चक्रपाणि , भोज ने सिरा, स्नायु, वसा, स्तन्य, एवं त्वचा को 'गति विवर्जित' कहा है। "गति विवर्जित" होने का तात्यपर्य गति रहित होना होता है।
That means the substances which are not subjected to any transformation are called Upadhatu.
नोट:- * वसा को शुद्ध मांस का स्नेह बताया है।
* सिरा की उत्पत्ति के सन्दर्भ में सुश्रुत ने कहा है कि सिरा मेद का स्नेह ग्रहण कर स्नायु को प्राप्त होती है। सिरा और स्नायु मे अन्तर स्पष्ट करते हुए बताया है कि सिरा मृदुपाक तथा स्नायु खरपाक के परिणाम हैं।
* आचार्य चरक के अनुसार -
(उपधातु)
रसात् स्तन्यं ततो रक्तमसृज: कण्डरा सिरा:।
मांसाद् वसा त्वच: षट् च मेदस: स्नायु सम्भव:।।
(च.चि. 15/17)
ततो = ' स्त्रिया:' इति पा।
मल (Mala)
निरुक्ति - " मृज्यते शोध्यते इति मल:"।
तातपर्य यह है कि जो शरीर को निर्मल एवं शोधित करे, उसे मल कहते हैं।
Means that which is clear out or purify the body is called mala.
*आचार्य शार्ङ्गधर - "मलिनीकरणान्मला:" (शा.पू.5/24)
जो शरीर को मलिन करे ,उसे मल कहते हैं।
Means that which pollute or dirty to other structures of the body is called mala.
* मला- मूत्राशकृत्स्वेदादयोऽपि च" (अ.ह्र.सू.1/13)
मूत्र, शकृत (पुरीष), स्वेद को मल कहा है।
भेद - आ. चरक ने आहार मल एवं धातु मलो का भेदपूर्वक वर्णन किया है-
किट्टमन्नस्य विणवमूत्रं रसस्य तु कफोऽसृज:। पित्तं, मांसस्य खमला, मल: स्वेदस्तु मेदस:।
स्यात् किट्टं केशलोमास्थनो, मज्ज्ञ: स्नेहोऽक्षि विटत्वचाम्। (च.चि. 15/18-19)
*आहार अन्न का मल - पुरीष (Stool)
- मूत्र (Urine)
नोट- अष्टांगह्रदय (लघुवाग्भट)- ने शुक्र का मल ओज को बताया है।
अष्टांगसंग्रहकार (वृद्धवाग्भट) - ने ओज को शुक्र का सार बताया है।
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Bahut acha
ReplyDeleteAise hi karte rhe ho
ReplyDeleteYes👍
DeleteThanku sir
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