शरीर क्रिया विज्ञान (# Ayurvedic physiology)
1. विषय प्रवेश
आयर्वेद का प्रयोजन
भावार्थ- धर्म,अर्थ,सुख (काम) नामक इन तीन पुरुषार्थो का साधन (प्राप्ति का उपाय) आयु है,अत:आयु (सुखायु) की कामना करने वाले पुरुष को आयुर्वेदशास्त्रो में निर्दिष्ट उपदेशों का परम (विशेष) आदर करना चाहिये।
शास्त्रो में उपदेश दो प्रकार के मिलते हैं-
(।) विधानात्मक - इन्हे करना चाहिये ।
(।।) निषेधात्मक - इन्हे नही ं करना चाहिये ।
2. चरक संहिता के अनुसार -
हिताहितं सुखं दु:खंमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेद: स उच्यते ।।( च. सू. 1/41)
भावार्थ- जिसमें हित आयु ,अहित आयु , सुख आयु और दु:ख आयु, इन चार प्रकार की आयु के लिये हित (पथ्य) ,अहित (अपथ्य), इस आयु का मान और आयु का स्वरुप बताया गया हो ,उसे आयुर्वेद कहा जाता है।
* आयुर्वेद शास्त्र के दो प्रयोजन हैं-
(।) स्वस्थ मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना ।
(।।) रोगी मनुष्य के रोग का निवारण करना ।
"प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् ,आतुरस्य विकार प्रशमनं च ।। (च.सू. 30/26)"
3. आचार्य सुश्रुत के अनुसार -
" इह खलु आयुर्वेद प्रयोजनं व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्ष:, स्वस्थस्य रक्षणं च ।(सु.सू. 1/14)"
भावार्थ - इस प्रकार आयुर्वेद के दो प्रयोजन दृष्टिगोचर( देखने को मिलता है ) होते है ं/
👉 पहला ,वह जिसके द्वारा स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके ,अर्थात् ऐसे आहार ,विहार ,औषध ,उपचारों का प्रयोग , जिसके द्वारा स्वस्थ मनुष्य का स्वास्थ्य बना रहे ।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इस प्रथम प्रयोजन को स्वस्थवृत्त (Hygine) विषय के रुप में वर्णित किया गया है। इसके अन्तर्गत Personal hygine , Public hygine ,Immunization आदि का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।
👉 दूसरा , वह प्रयोजन जिसके द्वारा आतुर के असात्म्य आहार - विहार से उतपन्न रोगों को निर्दिष्ट चिकित्सा के द्वारा रोग मुक्त किया जाता है । इस प्रयोजन की सिद्धि हेतु ही आयुर्वेद के आठ अंगो का उपदेश दिया गया है।
कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् ।
अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संश्रिता।। (अ.ह्र.सू. 1/5)
शारीर की व्याख्या
* "शरीरं अधिकृत्य कृतो ग्रन्थ: शारीर: ।" (अरुणदत्त)
शरीर को आधार मानकर लिखे गये ग्रन्थ को शारीर कहते हैं।
* "शरीरं अधिकृत्य कृतं तन्त्रं शारीरम् ।।"
Nice👍👍
ReplyDeleteThankyou DR
DeleteVery helpfull bro
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