शरीर घटकों का पॉंचभौतिकत्व # PANCHAMAHABHUTA THEORY
* ''सर्वं द्रव्यं पांचभौतिकमस्मिन्नर्थे ।'' (च.सू.26/10)
इस सिद्धान्त के अनुसार सभी द्रव्य पांचभौतिक होते हैं। दोष , धातु , मल जो शरीर के उपादान है ं वे भी महाभूतों से ही निर्मित होते है।
It has been said that all the object in the univers are composed of these Panchamahabhuta. It simply means that every thing in the universe is made and developed from these five basic elements viz. Akash, Vayu, Agni, Jala & Prithvi mahabhute
On theis ground , the human body is consider to be Panchamahabhautik in origine & the development, maintainance of the body is accomplished through the diets & nutrition which are also Panchabhautika in nature.
* दोषों का पांचभौतिक संगठन
# तत्र वायोरात्यैवात्मा, पित्तमाग्नेयं, श्लेष्मा सौम्य इति । (सु.सू. 42/5)
* धातुओं का पांचभौतिक संगठन -
* मलो का पांच भौतिक संगठन -
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लोक और पुरुष की साम्यता
मनुष्य सृस्टि का अंश है इसलिए उसमें तथा सृष्टि में समानता होना स्वाभाविक है। इस समानता को आचार्यों ने भली - भॉंति दर्शाया है। उन्होनें स्पष्ट कहा है कि जितने भी मूर्तिमान विशेष भाव इस लोक (प्रकृति) में है ,वे सब पुरुष (कर्म पुरुष) में भी है तथा जो पुरुष में है वे सब लोक मे है। इस प्रकार लोक एवं पुरुष सादृष्य है ।
' पुरुषोऽयं लोक संमित: ' कहकर भगवान आत्रेय ने पुरुष को लोक के समान बताया है ।
यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भाव विशेषास्तावन्त: पुरुषे , यावन्त: पुरुषे तावन्तो लोके इति ।(च.शा.5/3)
त्रिगुण और त्रिदोष का परस्पर सम्बन्ध (अष्ट प्रकृति का विवेचन)
संक्षेप में सांख्यमतानुसार पुरुष एवं प्रकृति दोनों अलग - अलग सृष्टि की उत्पत्ति करने में असमर्थ हैं , जब इनका संयोग होता है तभी सृष्टि का विकास होता है। प्रकृति जब पुरुष के सम्पर्क में आती है तो एक हलचल होती है, इससे प्रकृति मे स्थित त्रिगुण साम्यावस्था से विषमावस्था में आ जाते हैं। इन गुणों के आपस में भिन्न - भिन्न परिणाम में मिलने से भिन्न - भिन्न गुणों वाले भावों की उत्पत्ति होती है।
सर्वप्रथम प्रकृति से महत् (बुद्धि) की और फिर अहंकार की उत्पत्ति होती है । यह अहंकार तीन प्रकार का होता है - सात्विक , राजसिक, तामसिक /
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सत्वगुणोत्तरम् (सत्व) - पित्त
* त्रिगुण का महाभूतों से सम्बन्ध
तत्र सत्वबहुलमाकाशम् , रजोबहुलोवायु: सत्वरजोबहुलोऽग्नि : , सत्वतमो बहुला पृथिवी इति। (सु.शा.1/27)
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