प्रकृति परीक्षा का ज्ञान आयुर्वेदीय क्रिया शारीर एवं चिकित्सा का प्रमुख अंग है।
शरीर मे धातु साम्य बनाये रखना ही आयुर्वेद का उद्देश्य है और इसकी प्राप्ति हेतु मानव के देह एवं मन स्वभाव का परीक्षण अति आवश्यक है।
प्राय: देखा जाता है कि कुछ रोग विशिष्ट प्रकृति के व्यक्तियों में अधिक होता है और उनमें कुछ रोगों का आक्रमण भी शीघ्र होता है।प्रकृति ज्ञान के द्वारा धातु साम्य स्थापित कर शरीर के स्वास्थ्य को स्थिर रखा जा सकता है।
निष्पत्ति - प्र (उपसर्ग ) + 'कृ' ( धातु )
'प्रकरोति इति प्रकृति:' ( सु.शा.1/5 पर टीका)
👉🏻महर्षि सुश्रुत के अनुसार प्रकृति निर्माण -
"शुक्रशोणित संयोगे यो भवेद्दोष उत्कट: ।प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं श्रृणु।। (सु.शा.4/62)
शुक्र और शोणित के संयोगकाल में जिस दोष की उत्कटता (प्रबलता) होती है, उसी से पुरुष प्रकृति का निर्माण होता है। जब दोनों का संयोग होता है तब उनके अन्दर विद्यमान दोषों का भी संयोग होता है।
इस प्रकार वात, वात के साथ, पित्त ,पित्त के साथ तथा ,कफ, कफ के साथ मिलकर गर्भ का निर्माण करते हैं तब गर्भ में त्रिदोष बनता है।
👉🏻आचार्य वाग्भट के अनुसार 'प्रकृति' का निर्धारण -
शुक्रार्तवस्थैर्जन्मादौ विषेणेव विषक्रिमे:।।
तैश्च तिस्र: प्रकृतयो हीनमध्योत्तमा: पृथक् । समधातु: समस्तासु श्रेष्ठा, निन्द्या द्विदोषजा: ।।(अ.ह्र.सू.1/10)
दोषों से गर्भ - प्रकृति का वर्णन - गर्भाधान काल में माता - पिता के आर्तव तथा शुक्र में अधिकता से उपस्थित दोषों के अनुसार क्रमश: गर्भ की तीन प्रकृतियाॅं बनती हैं।
• वात दोष की अधिकता से - हीन प्रकृति
• पित्त दोष की अधिकता से – मध्यम प्रकृति
• कफ दोष की अधिकता से – उत्तम प्रकृति
• समधातु से - श्रेष्ठ
👉 प्रकृति निर्माण में अनेक कारण होते हैं जैसे-
1. शुक्र की प्रकृति
2. शोणित की प्रकृति
3. काल की प्रकृति
4. गर्भाशय की प्रकृति
5. माता के आहार-विहार की प्रकृति
6. पञ्चमहाभूत की प्रकृति
प्रकृति के प्रकार
आचार्य सुश्रुत – दोषानुसार - ७(सात) देह प्रकृति
त्रिगुण(मन) – १६(सोलह) मानस प्रकृति
पञ्चमहाभूत- ५(पॉंच) भौतिक प्रकृति
आचार्य चरक – सप्त देह प्रकृति।
छ: जात्यादि प्रकृति।
इस प्रकार देह प्रकृतियों की संख्या सभी आचार्यों ने सात बताई है-
‘सप्त प्रकृतयो भवन्ति – दोषै: पृथक, द्विश:, समस्तैश्च (सु.शा.4/61)
1. वात प्रकृति
2. पित्त प्रकृति
3. कफ प्रकृति
4. वातपित्तज
5. वातकफज
6. पित्तकफज
7. समप्रकृति
मानस प्रकृतियॉ-
मन त्रिगुणात्मक होता है। गर्भावस्था में जिस गुण की प्रधानता होती है उसी के अनुसार मानस प्रकृतियों का निर्माण होता है। तीन प्रकार की मानस प्रकृतियॉं होती हैं।
1.सात्विक प्रकृति- सात(७) भेद होते हैं-
1. ब्राह्म काय
2. माहेन्द्र या ऐन्द्र काय
3. वारुण काय
4. कौबेर काय
5. गान्धर्व काय
6. याम्य काय
7. ऋषि या आर्ष काय
2. राजस प्रकृति- छ: भेद है-
1. आसुर काय
2. सर्प काय
3. शाकुन काय
4. राक्षस काय
5. पैशाच काय
6. प्रेत काय
3. तामस काय- तीन भेद वर्णित है-
1. पशुकाय
2. मत्स्यकाय
3. वानस्पत्यकाय
✍️ सात्विक प्रकृति के लक्षण -
1. ब्रह्मकाय :- ऐसा व्यक्ति पवित्रता से रहता है, आस्तिक बुद्धि रखता है, ज्ञान विज्ञान का अभ्यास करता है, गुरुजनों एवं बडों का आदर सम्मान करता है, सत्यप्रतिज्ञ, जितात्मा, कार्य - अकार्य का विभाग करनें वाला वचन तथा प्रतिवचन से युक्त, स्मृतिवान, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अप्रसन्नता तथा असहिष्णुता से रहित एवं सब प्राणियों पर सम दृष्टि रखनें वाला है।
2. महेन्द्रकाय :- ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्यवान, शूरवीर, ओजस्वी, शास्त्रों के अनुसार आणरण करनें वाला, अपने आश्रितों का भरण - पोषण करनें वाला, दीर्घदर्शी, धर्म तथा काम में लगा रहता है।
3. वारुणकाय :- ऐसा व्यक्ति शूरवीर, सहनशील, पवित्रता से प्रेम एवं अपवित्रता से द्वेष रखने वाला, शीत पदार्थों रुचि रखने वाला, निन्दित कर्मों को न करने वाला, भाषण मे मधुर स्वाभाव रखने वाला होता है।
4. कौबेर काय :- ऐसा व्यक्ति सम्पन्न, मान - सम्मान से युक्त, नित्यकर्म, अर्थ (धन संचय) तथा काम (अधिक सन्तानोत्पत्ति) में प्रवृत्ति, स्पष्ट प्रसन्नता एवं अप्रसन्नता वाला होता है।
5. गान्धर्वकाय :- ऐसा व्यक्ति नाच गाने, बजानें, सुगन्धित वस्त्र, आभूषणों का शौकीन, इतिहास पुराण आदि में कुशल तथा स्वभाव में भ्रमणशील होता है।
6. याम्यकाय :- ऐसे व्यक्ति का आचार्य कर्त्तव्य - अकर्त्तव्य में मर्यादित रहता है तथा असीम उत्साह सम्पन्न, निर्भय, उत्तम स्मरणशक्ति युक्त, स्वच्छताप्रिय, राग, मोह, मद एवं द्वेष से विमुक्त, उद्यमी तथा ऐश्वर्यवान् होता है।
7. ऋषिकाय :- ऐसा व्यक्ति जप, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य का पालन करनें वाला, अतिथि पूजक, ज्ञानविज्ञान में निपुण, अहंकार, राग- द्वेष, मोह, लोभ एवं क्रोध रहित, प्रतिभावान तथा विचारवान होता है।
इस प्रकार कल्याण भाव से सम्पन्न होने के कारण ये सात भेद (उपरोक्त) शुद्ध सत्व के हैं।
✍️ राजस प्रकृति के लक्षण-
1. आसुरकाय :- ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्यवान, उग्र, क्रोधी एवं निर्दय स्वाभाव वाला, दूसरो के गुणों पर भी दोषारोपण करने वाला, भोजन में अकेला खानें वाला (असूयक) एवं पेटू तथा व्यवहार में स्वार्थी एवं कपटी होता है।
2. सर्पकाय :- ऐसा व्यक्ति क्रोध के समय शूर तथा अक्रोध के समय भीरु (डरा हुआ), घातक (तीक्ष्ण), परीश्रमी, आहार - विहार में चपल तथा कपटी होता है।
3. शाकुनकाय :- ऐसा व्यक्ति अत्यन्तकामी, असहिष्णु , चंचल चित्तवाला, हर समय आहार - विहार में रत तथा धन आदि का संचय करनें वाला होता है।
4. राक्षस काय :- ऐसा व्यक्ति सहिष्णु , दीर्घकाल तक क्रोध में रहनें वाला निर्दयी, अत्यन्त परीश्रमी, ईष्यालु , अधर्म आचरणवाला तथा अत्यन्त आत्मश्लाघी होता है।
5. पैशाच काय :- उच्छिष्ट आहार का सेवन करनें वाला , तीक्ष्ण स्वाभाव वाला, सदैव स्त्रियों में आसक्त रहनें वाला , लज्जा से रहित (निर्लज्ज) , भीरु, दूसरों को डरानें वाला होता है।
6. प्रेत काय :- असंविभाग (दूसरों को न देकर खाना), आलसी, दु:खी, असूचक (निन्दा करने वाला), लोभी, दान न करनें वाला , इन लक्षणों से युक्त पुरुष प्रेत सत्व वाला होता है।
* राजस प्रकृति में रोष का अंश अधिक होता है।
✍️तामस प्रकृति के लक्षण -
1. पशुकाय :- ऐसे व्यक्ति बुद्धिहीन, कामुक, नीच, वेषभूषा युक्त, दूसरों की वस्तु को छीन लेने की प्रवृत्ति वाले, निन्दित आहार - विहार वाले, अत्यधिक सोने वाले होते है।
2. मत्स्यकाय :- ऐसे पुरुष मूर्ख, डरपोक, आहार लोलुप, परस्पर झगडनें वाले, अस्थिर चित्त वाले, जलप्रेमी, निरन्तर चलना - फिरना पसन्द करनें वाले होते हैं।
3. वानस्पत्यकाय :- अत्यन्त आलसी, एक स्थान पर ही रहनें की इच्छा वाले, सब प्रकार के ज्ञान से शून्य, नित्य खाने में लगे रहने वाले एवं धर्म, अर्थ, काम से विरहित होते हैं।
*तामस प्रकृति में मोह अधिक रहता है।
महत्वपूर्ण बिन्दु :-
# सात्विक प्रकृति वाला व्यक्ति सुख के समय उत्कर्ष न प्रकट कर और दु:ख के समय दीनता न दिखाकर शान्त स्वाभाव से आयु का सुख भोगता है।
# राजस स्वभाव वाला व्यक्ति सुख को घमण्ड के साथ और दु:ख को दीनता से अनुभव करता है, अर्थात् सुख में सुखी और दु:ख में अत्यन्त दु:खी होता जाता है।
# तामस स्वाभाव वाला व्यक्ति अकारण ही सदैव दु:खक्रान्त रहता है।
👉 देह प्रकृति का वर्णन-
* वात प्रकृति पुरुष के लक्षण:-
शारीरिक लक्षण -
शरीर रुक्ष,कृश तथा कुरुप होता है। अंग बेडोल तथा आकृति लम्बी होती है। शरीर पर कण्डरायें और शिरायें उभरी रहती हैं। त्वचा रुक्ष तथा फटी हुई होती है। नेत्र खर, धूसर, कुरुप तथा मृतप्राय: होती है। स्वर अत्यन्त जर्जर तथा रुक- रुक कर बोलने वाला है। अंग हर समय फडकते रहते है। शीत को सहन नहीं कर सकता है अत: शीत के कारण शरीर में कम्प तथा स्तम्भन हो जाता है।
मानसिक लक्षण -
कार्य में शीघ्र प्रवृत्त हो जाने की आदत होती है। किसी बात को शीघ्र ही ग्रहण कर लेता है परन्तु अल्प स्मृति के कारण शीघ्र ही भूल जाता है। बहुत बोलने वाला तथा अदृढ़ स्वाभाव वाला होता है। शीघ्र ही क्षुब्ध हो जाता है। धैर्य रहित, कृतघ्न, तथा मैत्री मे अदृढ़ होती है।
👉 आचार्य चरक के अनुसार -
शरीर रुक्ष, कृश (पतला) तथा कुरुप होता है। त्वचा रुक्ष तथा फटी हुई होती है।
अंग हर समय फडकते रहते हैं। तेजी से चलता है और चलते समय सन्धियों (जोडों) में शब्द होती है। भोजन अल्प मात्रा मे करता है तथा कम बलशाली होता है।
" वातलानां तु वाताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने विषमा भवन्त्यग्नय:।" (च.वि.6/12)
वातल मनुष्यों के वातस्थान वात से अभिभूत (अधिक प्रभाव) होने के कारण इनकी अग्नि विषम होती है।
👉आचार्य शार्ङ्गधर के अनुसार-
अल्पकेशो कृशो रुक्षो वाचालश्चल मानस:।
आकाशचारी स्वपनेषु वात प्रकृतिको नर:।।(शा.पू. 6/20)
वात प्रकृति पुरुष अल्पकेशयुक्त, कृश (दुबला-पतला) तथा रुक्ष शरीर वाला, वाचाल(वातूनी), चपल तथा स्वप्न में आकाश में विचरने वाला होता है।
* पित्त प्रकृति पुरुष के लक्षण -
✍️ शारीरिक लक्षण - शरीर सुकुमार तथा वर्ण में गौर होता है। शरीर के अंग पेशियॉं तथा सन्धियॉं शिथिल रहती हैं। अंग पर झुर्रियॉं शीघ्र पड़ जाती हैं। केश जल्दी ही श्वेत हो जाते हैं और गंजापन भी हो जाता है। स्वेद बहुत आता है, दुर्गन्धमय होता है।
भूख- प्यास अधिक लगती है। शीतल वस्तुओं की इच्छा होती है। त्वचा पर पिल्लु ,व्यंग तथा तिल अधिक होते हैं। पिडिकाएं बहुत निकलती हैं।
✍️ मानसिक लक्षण - पित्त प्रकृति पुरुष तीक्ष्ण स्वाभाव का होता है। शीघ्र ही क्रोधित तथा शीघ्र ही शान्त हो जाने वाला, श्रृंगारप्रिय, वीर, साहसी, बुद्धिमान, मेधावी, उत्तम धारणशक्ति सम्पन्न, भयरहित प्रतिवादी के पक्ष का खण्डन कर बोलनें वाला होता है। दानी, प्रेमी, उत्तमचरित्रवान् होता है।
👉 आचार्य चरक के अनुसार-
" पित्तलानां तु पित्ताभिभूते ह्यग्न्याधिष्ठाने तीक्ष्णा भवन्त्यग्नय:।" (च.वि.6/12)
पित्त प्रधान पुरुषो के अग्नि अधिष्ठान में पित्त की अधिकता के कारण अग्नियॉं तीक्ष्ण होती हैं।
👉 शार्ङ्गधर के अनुसार -
"अकाल पलितैर्व्याप्तो धीमान् स्वेदो च रोषण:।
स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्त प्रकृतिको नर: ।।" (शा.पू. 6/21)
समय से पूर्व बालों का पकना, बुद्धिमान, स्वेदी (अधिक पसीने वाला), क्रोधी तथा स्वपन में ज्वाला युक्त अग्नि को देखना, ये पित्तप्रकृति पुरुष के लक्षण हैं।
कफ प्रकृति पुरुष के लक्षण -
शारीरिक लक्षण-
शरीर सुन्दर, सुडोल तथा सुविभक्त होता है। अंग स्थिर, पुष्ट तथा भरे हुये, बाहें लम्बी तथा गोल, वक्षस्थल पुष्ट एवं मस्तक ऊॅंचा होता है। वर्ण निर्मल एवं दूर्वानीलकमल, कमल, कोमल, गोरोचन अथवा सुवर्ण के समान होता है। मुख से प्रसन्नता टपकती है। नेत्र प्रसन्न, विशाल, पलकें काली होती है। केश काले चमकदार होते हैं। चाल सारयुक्त, दृढ़ तथा स्थिर हाथी के समान होती है। स्वर गम्भीर होता है। अत्यधिक वीर्यवान, मैथुनशक्ति सम्पन्न होता है। शारीरिक विकार अत्यन्त अल्प होतें हैं।
मानसिक लक्षण-
सात्विक चित्तवाला, सत्यवादी, धर्मात्मा, स्मृतिवान तथा मान को महत्व देने वाला एवं स्थिर स्वभाव का होता है। मन तथा वचन प्रवृत्ति में शीघ्रता नही करता। कृतज्ञ, वीर, सहनशील, ओजस्वी, शान्त, दीर्घायु, निर्लोभी, तथा धनवान होता है। सोच- समझकर कार्य करने वाला तथा हमेशा निश्चित बात कहने वाला होता है।।
भूख, प्यास, दु:ख, क्लेश सहन करने वाला होता है। आयुष्मान, धनवान, ऐश्वर्यवान होता है।
✍️आचार्य चरक के अनुसार- कफ प्रकृति पुरुष के लक्षण,-
"श्लेष्मलानां श्लेष्माभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने मन्दा भवन्त्यग्न्य:"(च.वि.6/12)
श्लेष्मल (कफ प्रकृति) पुरुषो में अग्नि अधिष्ठान कफ के प्रभाव में रहनें के कारण इनकी पाचक आदि अग्नियॉं मन्द होती हैं।
✍️ आचार्य शार्ङ्गधर के अनुसार-
गम्भीर बुद्धि: स्थूलाङ्ग: स्निग्धकेशो महाबला:।
स्वप्ने जलाशयलोकी श्लेष्म प्रकृतिको नर:।। (शा.प.6/22)
श्लेष्मल व्यक्तियों में गम्भीर बुद्धि, स्थूल अंग, केश स्निग्ध एवं बलवान होना, ये गुण पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त ये स्वप्न में जलाशय( नदी, तालाब) को देखनें वाले होते हैं।
प्रकृति ज्ञान का प्रयोजन
✍️ आयुर्वेद के दोनों हेतु प्रकृति ज्ञान का विशेष महत्व है। इसकी जितनी उपयोगिता ‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्’ हेतु है उतनी ही रोगी की चिकित्सा के लिये भी। अतएव आयुर्वेद के उभयविध प्रयोजन में प्रकृति ज्ञान विशेष महत्व रखता है।
✍️ स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा स्वस्थवृत्त विषय के परिपालन द्वारा ही सम्भव है।
आयुर्वेद के द्वितीय प्रयोजन हेतु भी प्रकृति ज्ञान उतना ही परमावश्यक है। प्रायः देखा गया है कि कुछ विशेष रोग विशेष प्रकार के व्यक्तियों में बहुलता से पाये जाते है। उसमें कुछ रोगों का आक्रमण भी शीघ्र ही होता है।
✍️आयुर्वेद के अनुसार इनका कारण मनुष्य की प्रकृति ही है।
'कायानां प्रकृतीर्ज्ञात्वा त्वनुरुपां क्रियां चरेत् ।(सु.शा. 4/98)'
प्रकृति के लक्षणों को जानकर ही उसके अनुरुप चिकित्सा करने का उपदेश महर्षि सुश्रुत ने दिया है।
🌱 प्रकृति परीक्षण विधि
आचार्यों द्वारा बताए गये लक्षणों को आधुनिक (Modern) दृष्टि से चार भागों में विभक्त किया जा सकता है -
👉 शरीर रचना सम्बन्धी लक्षण (Physical symptoms)-शरीर की रचना (Body), स्वाभाविक रंगरुप (Colour), केश- रोम (Hair), नेत्र (Eyes), शाखाएं (Limbs), दन्त (Teeth), सन्धियॉं (Joints), मांस पेशियॉं (Muscles).
👉 शरीर क्रिया सम्बन्धी लक्षण (Physiological symptom) - चेष्टा ( Movment), गति (Speed), वाणी (Voice), श्वसन एवं श्वसन गति (Respiration), भूख की आदत (Appetite & Eating habit),प्यास (Thirst), निद्रा (Sleep), स्वप्न (Dreams), प्रिय रस (Favourable test), उत्सर्जन (Excretion).
👉 मनोविज्ञान सम्बन्धी लक्षण (Psychological symptom) - स्वाभाव Nature), उपक्रम (Initiative), उत्तेजनशीलता (Excitability), भय (Fear), क्षोभ (Perturb ability), ग्राह्यशक्ति (Recetive power), स्मृति (Memory), असहिष्णुता (Intolerance).
👉 समाज सम्बन्धी लक्षण (Sociological symptom) - आचरण (Behaviour), धर्म के प्रति लगाव (Religious faith), कामोत्तेजना (लिंग शक्ति) {Libido}.
📝 किसी प्रकार का सन्देह, सुझाव अथवा प्रश्न हो तो कमेंट करके अवश्य पूछें।
धन्यवाद- ..........
👍👍🙏🙏
ReplyDeleteThank you
Delete